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chausath yogini

RAHASYA

64 yogini 64 योगिनी

64 योगिनी जैसे नाम से ही पता चलता है की 64 योगिनी 64 देवियों की शक्ति है क्योंकि परलोक की शक्तियां असंख्य अंश से मिलकर बनी होती है इसलिए यह 64 देवियां एक देवी के रूप में भी आ सकती है और चाहे तो अलग-अलग 64 रूपों में आ सकती है  पंच तत्वों से निर्मित शरीर रूप नहीं बदल सकते लेकिन पारलौकिक शक्तियां कितने भी रूप धारण कर सकती हैं आपने 64 योगिनियों के बारे में बहुत कुछ सुना होगा यह सभी आदिशक्ति मां काली के अंश अवतार कहलाते हैं तो कभी मां दुर्गा के दुर्गाकुल के अवतार कहलाते हैं यह सभी शक्तियां मां पार्वती महालक्ष्मी महाकाली और मा सरस्वती के अंश से भी उत्पन्न हुई है असल में सभी देवियों के अंश से कई योगिनिया उत्पन्न होती हैं जो उनकी सेविकाएं होती हैं 64 योगिनियों में 10 महाविद्याएं नवदुर्गाएं और अन्य शक्तियों के अवतारी अंश होते हैं इन्हें प्रमुखतः मां काली और मां दुर्गा के कुल से संबंध बताया जाता है  योगिनी शक्तियों का प्रयोग इंद्रजाल षट्कर्म वशीकरण मारण मोहन स्तंभन जैसी क्रियाओं व धन प्राप्ति व्यापार उन्नति में होता है जब इनका उद्देश्य सात्विक व पवित्र हो तो जल्दी सिध्द हो जाती है कोई भी साधक चाहे तो 64 योगिनी साधना के द्वारा इन्हें सिद्ध कर सकता है या किसी एक योगिनी को भी सिद्ध कर सकता है 64 योगिनी साधना करवाने की क्षमता बहुत ही कम गुरुओं में है क्योंकि 64 योगिनी शक्ति बहुत शक्तिशाली है  इनको संभालना भी बहुत सावधानी का कार्य है वैसे तो देश में कई राज्यों में 64 योगिनी मंदिर है जैसे उड़ीसा और मध्य प्रदेश हम मध्य प्रदेश के भेड़ाघाट में स्थित 64 योगिनी मंदिर के विषय में जानकारी देने जा रहे हैं  इस मंदिर में गोलाकार आकृति में 64 योगिनीया स्थापित की गई हैं और उनके बीचो-बीच शिव पार्वती का मंदिर निर्मित है  यह मंदिर जबलपुर से लगभग 20-22 किलोमीटर दूर सफेद संगमरमर चट्टानों के लिए प्रसिद्ध भेड़ाघाट पर्यटन स्थल में उपस्थित है इन मंदिर की मूर्तियों को विधर्मियों ने खंडित किया था लेकिन आज भी यह मंदिर उपस्थित है एक समय तंत्र साधना का बहुत ही अच्छा केंद्र इस 64 योगिनी मंदिर में था यहां तंत्र विद्या भी सिखाई जाती थी यह मंदिर गोलकी मठ के नाम से भी प्रसिद्ध था लेकिन मुगलों के शासनकाल में यहां तंत्र साधनाएं बंद करा दी गई और गोलकी मठ को भी बंद कर दिया गया यहां दोबारा पूजा पाठ की शुरुआत बहुत ही बाद में हुई यह स्थान भेड़ाघाट 64 योगिनी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है इस मंदिर में भेड़ाघाट के समीप छोटी सी ढाई सौ मीटर ऊंची पहाड़ी पर गोलाकार रूप में 64 योगिनियों की प्रतिमा स्थापित है और बीचो-बीच भगवान शिव की प्रतिमा है  चारों तरफ यह 64 योगिनीया ऐसी प्रतीत होती हैं जैसे शिवजी को ही देख रही हो इस मंदिर का निर्माण कलीचुरी वंश ने करवाया था यह मंदिर रानी दुर्गावती के राज्य में आता है ऐसी मान्यता है कि यहां पर दुर्वासा ऋषि ने साधना की थी अपनी नर्मदा परिक्रमा के दौरान  इसके बाद से यह स्थान साधना के लिए पवित्र माने जाने लगा था बाद में यहां पर मंदिर निर्माण कराया गया ऐसा माना जाता है कि यहां की नव विवाहित रानी नोहला देवी जब यहां आई तो सर्वप्रथम उन्होंने भगवान शिव के मंदिर का निर्माण करवाया और प्रांगण के तौर पर गोलाकार गोलकी मठ का निर्माण करवाया और फिर 64 योगिनियों की मूर्तियों का निर्माण करवाया गया इस प्रकार यह मंदिर बनकर तैयार हुआ 64 योगिनी पवित्र शक्तियों में से मानी जाती हैं जो साधक की जीवन पर्यंत प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सहायता करती हैं योगिनी शक्ति सबसे उत्तम शक्ति होती है एक साधक के लिए सिद्धि के रूप में 64 योगिनियों में एक महालक्ष्मी योगिनी भी होती हैं जो माता लक्ष्मी का अंश अवतार है इस अंश अवतार की सिद्धि श्री शिवम गुरुजी ने प्राप्त करने के बाद साधना क्षेत्र में एक विस्फोट ला दिया था और 64 योगिनियों की लुप्त हुई साधना को दोबारा प्रचलन में ला दिया श्री शिवम गुरुजी बहुत ही कम आयु के ऐसे साधक व बाद में गुरु हुए जिन्होंने कठिन और उग्र बताई जाने वाली साधनाओं को भी बहुत ही सरल रूप से साधकों के बीच उपलब्ध करा दिया श्री शिवम जी बड़ी साधनाओं में रातों-रात प्रसिद्ध हो गए  क्योंकि उन्होंने ऐसी साधना सिद्ध की जिसमें कोई प्रतिद्वंद्वी थे ही नहीं कोई और इन साधनाओं को करने की हिम्मत जुटा ही नहीं पाया या उचित गुरु ही उपस्थित नहीं थे श्री शिवम जी ने वही साधनाएं आमजन में प्रचार व प्रसार की जो साधकों के जीवन में उन्नति प्रदान करें 64 योगिनी साधना भी पवित्र रूप में साधकों के बीच में शिवम् जी ने प्रकट की—— जय मां 64 योगिनी

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श्री महालक्ष्मी व्रत कथा Mahalakshmi vrat katha

एक समय की बात है महर्षि द्वैपायन व्यास जी हस्तिनापुर आए । उनका आगमन सुनकर समस्त राजकुल के कर्मचारी महाराज भीष्म सहित उनका सम्मान आदर करते हुए राजमहल में महाराज को सोने के सिंहासन में विराजमान कर अधर्य – पाद्य आचमन से उनका पूजन किया । व्यास जी के विश्राम होने पर राजा रानी गांधारी ने माता कुंती से हाथ जोड़कर प्रश्न किया की है महाराज आप त्रिकालदर्शी हैं । आपको सभी की जानकारी है आपसे हमारी प्रार्थना है कि स्त्रियों को कोई ऐसा व्रत पूजन बताइए जिससे हमारे राज्य लक्ष्मी सुख, पुत्र परिवार सदा सुखी रहे इतना सुनकर व्यास जी ने कहा हम ऐसे व्रत का उल्लेख कर रहे हैं जिससे सदा लक्ष्मी जी स्थिर होकर आपको सुख प्रदान करेंगे यह श्री महालक्ष्मी जी का व्रत है जिसे 16 दिन तक किया जाता है जिसका पूजन प्रतिवर्ष अश्विनी कृष्ण पक्ष की अष्टमी का माना जाता है तब राजा रानी गांधारी ने कहा महात्मा यह व्रत कैसे प्रारंभ किया जाता है इसका विधान क्या है विस्तार से हमें बताने की कृपा करें महर्षि जी ने कहा भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन सुबह मन में व्रत का पालन करें संकल्प लेकर किसी जलाशय में जाकर स्नान करके वस्त्र स्वच्छ वस्त्र या नए व्यस्त धारण कर सकते हैं दूर्वा से महालक्ष्मी जी को जल का तर्पण करके प्रणाम करना चाहिए फिर घर आकर शुद्ध 16 धागों वाले धागे का एक धागा बनाकर प्रतिदिन एक गांठ लगानी चाहिए इस 16 दिन की 16 गांठ का एक धागा तैयार कर अश्वनी माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को व्रत रखकर मंडप बनाकर चंदोबा तान कर उसके नीचे माटी के हाथी पर महालक्ष्मी माता की मूर्ति स्थापित कर तरह तरह के पुष्प माला से लक्ष्मी जी व हाथी का पूजन करें व तरह तरह के  पकवान बना सकते हैं  लक्ष्मी जी और हाथी का पूजन नैवेद्य समर्पण करके करना चाहिए ।श्रद्धा सहित महालक्ष्मी व्रत करने से आप लोगों की राजलक्ष्मी सदा स्थिर रहेगी, ऐसा विधान बताकर व्यास जी अपने आश्रम को चले गए।   इधर समय के अनुसार भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी से समस्त राजघराने में नारियों व नगर स्त्रियों ने महालक्ष्मी जी का व्रत प्रारंभ कर दिया बहुत सी नारी ने गांधारी के साथ प्रतिष्ठा पाने हेतु व्रत का साथ देने लगी । कुछ नारियां माता कुंती के साथ भी व्रत आरंभ करने लगी । पर, गांधारी जी द्वारा कुछ द्वेष भाव चलने लगा ऐसा होते-होते 15 दिन व्रत के समाप्त होकर 16वा  दिन अश्वनी कृष्ण पक्ष की अष्टमी आ गई उस दिन प्रात काल से नर नारियों ने उत्सव मनाना आरंभ कर दिया और समस्त नर नारी राजमहल में गांधारी जी के यहां उपस्थित हो तरह-तरह से महालक्ष्मी जी के मंडप व  माटी के हाथी बनाने सजाने की तैयारी करने लगे। गांधारी जी ने नगर की सभी प्रतिष्ठित नारियों को बुलाने को सेवक भेजा ,पर माता कुंती को नहीं बुलवाया और ना कोई सूचना भेजी । उत्सव में बाजे गाजे की धुन बजने लगी जिससे सारे हस्तिनापुर में खुशी की लहर दौड़ गई । माता कुंती ने इसे अपना अपमान समझकर बड़ा रंज बनाया और व्रत की कोई तैयारी नहीं ।कि इतने में महाराज युधिष्ठिर ,अर्जुन ,भीम सेन, नकुल ,सहदेव सहित पांचो पांडव उपस्थित हो गए ,तब अपनी माता को गंभीर देख अर्जुन ने प्रार्थना की- माता आप इतने दुखी क्यों हो ? क्या हम आपके दुख का कारण समझ सकते हैं और दुख दूर करने में भी सहायक हो सकते हैं ? आप बताएं – तब माता कुंती ने कहा -बेटा कुल में अपमान ( रिश्तेदारों द्वारा किया अपमान) से बढ़कर कोई दुख नहीं है आज नगर में महालक्ष्मी व्रत उत्सव में रानी गांधारी ने सारे नगर की औरतों को सम्मान से बुलाकर ईर्ष्या पूर्वक मेरा अपमान कर उत्सव में मुझे नहीं बुलाया है पार्थ ने कहा माता क्या वह पूजा का विधान सिर्फ दुर्योधन के महल में ही हो सकता है ,आप अपने घर में नहीं कर सकती ? तब कुंती ने कहा बेटा कर सकती हूं पर साज-समान इतनी जल्दी तैयार नहीं हो पाएगा,क्योंकि गांधारी के सौ पुत्रों ने माटी का विशाल हाथी तैयार किया है और पूजन करके सजाया है ऐसा विधान तुमसे ना बन सकेगा उनके उत्सव की तैयारी आज दिन भर से हो रही है तब पार्थ ने कहा माता आप पूजन की तैयारी कर नगर में बुलावा भेजे । मैं ऐसा हाथी पूजन में लेकर आऊंगा की हस्तिनापुर वासियों ने नहीं देखा होगा ना ही उसका कभी पूजन किया होगामैं आज ही इंद्रलोक से इंद्र का हाथी ऐरावत जो बहुत ही पूजनीय है उसे बुलाकर लेकर आता हूं आप अपनी तैयारी करें फिर इधर भी माता कुंती ने सारे नगर में पूजा का ढिंढोरा पिटवा दिया पूजा की विशाल तैयारी होने लगी तब अर्जुन ने सुरपति को एरावत भेजने को पत्र लिखा और एक दिव्य बाण में बांधकर धनुष पर रखकर देवलोक इंद्र की सभा में फेंका बाण से इंद्र ने पत्र निकाल कर पड़ा तो अर्जुन को लिखा की है पांडु कुमार ऐरावत भेज तो दूंगा पर इतनी जल्दी स्वर्ग से कैसे उतर सकता है तुम इसका उत्तर शीघ्र लिखो पत्र पाकर अर्जुन ने बाणो का रास्ता बनाकर हाथी के उतरने की बात लिखकर पत्र वापस कर दिया इंद्र ने सारथी को आज्ञा दी के हाथी को पूर्ण रूप से सजाकर हस्तिनापुर में उतारने का प्रबंध करो महावत ने तरह-तरह के साज समान से ऐरावत को सजाया देवलोक की अंबरझूल डाली गई स्वर्ण की पालकी रत्न जड़ित कलशों  से बांधी गई, माथे पर रत्न जड़ित जाली सजाई गई, पैरों में घुंघरू सोने की मड़िया बांधी गई जिनकी चका चौंध पर मानव जाति की आंखें नहीं ठहर सकती थी https://youtu.be/s7X1DVR17vQ इधर सारे नगर में धूम हुई की कुंती माता के घर सजीव इंद्र का ऐरावत बाणों के रास्ते पर स्वर्ग से उतरकर पूजा जाएगा सारे नगर के नर नारी बालक और वृद्धों की भीड़ एरावत को देखने एकत्रित होने लगी गांधारी के राजमहल में भी इस बात की चर्चा फैल गई नगर की नारियां पूजा थाली लेकर भागने लगी माता कुंती के महल में उपस्थित होने लगी देखते ही देखते सारा महल पूजन करने वाली नारियों से भर गया सारे नगर

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